Supreme Court का बड़ा फैसला, मुआवजे की देरी में जेब से देना होगा जुर्माना
Supreme Court - सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि दुर्घटना मुआवजे (compensation) के भुगतान में देरी होती है तो उस पर लगाया गया जुर्माना नियोक्ता को अपनी जेब से ही भरना होगा...कोर्ट की ओर से आए इस फैसले को विस्तार से जानने के लिए खबर को पूरा पढ़ लें-
HR Breaking News, Digital Desk- (Supreme Court) सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि दुर्घटना मुआवजे के भुगतान में देरी होने पर लगाया गया जुर्माना नियोक्ता को अपनी जेब से ही देना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी (insurance company) केवल मुआवजा राशि तक ही जिम्मेदार होगी, जबकि देरी का जुर्माना नियोक्ता को ही भरना पड़ेगा।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह एक सामाजिक कल्याण से जुड़ा कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए, ताकि पीड़ित कर्मचारियों (aggrieved employees) को समय पर और उचित राहत मिल सके।
नियोक्ता को खुद भरना होगा जुर्माना-
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले (P. B. Varale) की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत पहले भी कई फैसलों में इस कानून की कर्मचारियों के हित में उदार व्याख्या करने पर जोर दे चुकी है। पीठ ने स्पष्ट किया कि मुआवजे से जुड़ी धारा 4A(3)(B) के तहत जुर्माने के भुगतान की जिम्मेदारी सीधे नियोक्ता पर ही तय की गई है।
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द-
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला The New India Assurance Company Limited की याचिका पर सुनाया। याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें मुआवजे के भुगतान में देरी पर जुर्माना बीमा कंपनी को देने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि जुर्माना नियोक्ता को ही देना होगा।
सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से बनाया गया कानून-
फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि कानून के उद्देश्यों को पढ़ने से साफ होता है कि यह संसद द्वारा बनाया गया एक सामाजिक कल्याण कानून है। इसका मकसद नौकरी के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करना और उन्हें समय पर उचित मुआवजा दिलाना है, ताकि घायल कर्मचारी इलाज का खर्च (Injured employee medical expenses) उठा सके या मृत्यु की स्थिति में उसका परिवार आजीविका चला सके।
क्या था मामला-
साल 2017 में नियोक्ता की गाड़ी चलाते समय एक कर्मचारी की मौत हो गई।
मुआवजा न मिलने पर मृतक के परिवार ने जुलाई में श्रम आयुक्त से संपर्क किया।
आयुक्त ने 7.36 लाख रुपये मुआवजा, 12% ब्याज और देरी के लिए 35% यानी 2.57 लाख रुपये जुर्माना नियोक्ता पर लगाया।
वाहन का वैध बीमा होने के कारण, जुर्माने को छोड़कर मुआवजे की राशि बीमा कंपनी द्वारा भुगतान की जानी थी।
हालांकि, श्रम आयुक्त (labor commissioner) के फैसले को पलटते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि जुर्माने की राशि भी बीमा कंपनी द्वारा ही अदा की जानी थी, न कि नियोक्ता द्वारा।
सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के संशोधन का भी किया उल्लेख-
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने Delhi High Court के फैसले को पलटते हुए कहा कि 1995 के संशोधन में जानबूझकर जुर्माने को मुआवजा और ब्याज (compensation and interest on fines) से अलग रखा गया था। इसका उद्देश्य बीमा कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय नियोक्ताओं को समय पर भुगतान के लिए बाध्य करना है, ताकि कानून का मकसद प्रभावी बना रहे।