Property Right's : क्या संत्तान के नाम की गई संपत्ति ली जा सकती है वापस, जानें क्या कहता है कानून
HR Breaking News (Property Dispute) परिवार में संपत्ति को लेकर कई विवाद सामने आते हैं। अक्सर देखा गया है कि माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी अपनी संतान के नाम कर देते हैं, लेकिन कई बार बच्चे घर हाथ में आते ही तेवर दिखाने लगते हैं। घर (Property Dispute), जमा पूंजी हासिल करने के बाद यही मां-बाप बच्चों को बोझ समझने लगते हैं। ऐसे में आइए खबर में जानते हैं कि इस बारे में कानून क्या कहता है।
किस स्थिती में वापस मिलेगी संपत्ति
अदालत ने क्लियर कहा है कि अगर बच्चों (Property Transfer to Children) को माता-पिता की देखभाल करने की शर्त पर संपत्ति (Property Right's ) दी गई थी और बच्चे ऐसा नहीं करते हैं तो वह गिफ्ट डीड रद्द हो सकती है और संपत्ति वापस मिल सकती है। अब बीते वर्ष 2 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित मामले में इस मामले को लेकर ऐलान किया है।
जानिए क्या था पूरा मामला
अब हाल ही में एक मामला (Senior Citizen Rights India) सामने आया है। यह मामला एमपी के छतरपुर की रहने वाली बुजुर्ग महिला उर्मिला दीक्षित (Urmila Dixit Case) से जुड़ा हुआ है। बुजुर्ग महिला उर्मिला दीक्षित ने जनवरी 1968 में एक संपत्ति की खरीद की थी। उसके बाद सितंबर 2019 में उन्होंने यह संपत्ति अपने बेटे सुनील शरण दीक्षित को गिफ्ट डीड के माध्यम से दे दी। उस समय दस्तावेज में यह शर्त स्पष्ट थी कि बेटा अपनी मां की देखभाल करता है। इसके साथ ही उसी दिन एक अलग वचन पत्र यानी की प्रॉमिसरी नोट भी तैयार किया गया, जिसमे साफ लिखा था कि बेटा अपने माता-पिता का पूरा ध्यान रखेगा और उनकी सेवा करेगा और अगर वो ऐसा नहीं करता है तो मां संपत्ति वापस ले सकती हैं।
लेकिन कुछ ही समय में हालात एकदम उलटे हो गए। मां ने बताया कि बेटे ने उनसे और उनके पति से मारपीट की और बदसलुकी की और और प्रोपर्टी ट्रांसफर करने का दबाव बनाया। अदालत ने क्लियर कहा कि माता-पिता एवं सिनियर सिटीजन (senior citizens property rights) भरण-पोषण अधिनियम, 2007 जैसे कानून के मकसद को को ध्यान में रखते हुए समझा किया जाना चाहिए। बुजुर्गों के संरक्षण के लिए ये कानून बनाया गया है।
SDM के पास दर्ज हुई शिकायत
जैसे ही ये सब घटनाएं (Parents vs Children Property Dispute) हुई, उसके बाद 24 दिसंबर 2020 को उर्मिला दीक्षित ने छतरपुर के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (Sub-Divisional Magistrate) के पास शिकायत रिकॉर्ड कराई। उन्होंने माता-पिता एवं सिनियर सिटीजन भरण-पोषण अधिनियम, 2007 की धारा 22 और 23 के तहत मांग की कि इस गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया जाना चाहिए और उनको संपत्ति वापस मिलनी चाहिए। SDM ने उनकी शिकायत पर गौर रकते हुए गिफ्ट डीड को नल एंड वॉइड ऐलान कर दिया।
लंबी कानूनी यात्रा से गुजरा यह मामला
इस मामले पर पहले तो SDM ने मां के पक्ष में फैसला सुनाया और गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया। उसके बाद बेटे ने कलेक्टर के पास अपील की, लेकिन कलेक्टर के पास भी फैसला मां के पक्ष में सुनाया गया। उसके बाद मामला एमपी हाई कोर्ट पहुंचा। पहले सिंगल जज बेंच ने SDM और कलेक्टर के फैसले को सही ठहराया और कहा कि बेटे ने अपने माता-पिता की सेवा नहीं की ।
उसके बाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने बेटे के पक्ष में फैसला दे दिया उनका कहना था कि अगर गिफ्ट डीड में देखभाल की शर्त नहीं लिखी है तो कानून की धारा 23 लागू नहीं होगी। उसके बाद उर्मिला दीक्षित ने सुप्रीम कोर्ट पर गुहार लगाई।
सुप्रीम केस ने पलटा हाई कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की बेंच (supreme court bench) और जस्टिस ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। अदालत ने क्लियर कहा कि गिफ्ट डीड और परोमिस नोट (promissory note) दोनों में क्लियर था कि बेटे को अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करनी थी। जैसे कि यह शर्त पूरी नहीं हुई, इस वजह से इस गिफ्ट डीड को रद्द कर देना सही था। सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर दिया है कि प्रोपर्टी का कब्जा 28 फरवरी 2025 तक मां को वापस दिया जाना चाहिए।
अदालत ने बुजुर्गों की स्थिती पर जताई चिंता
अदालत ने फैसले में बुजुर्गों (Supreme Court Gift Deed Ruling 2025) की स्थिती को लेकर बातचीत की गई। कोर्ट ने क्लियर कहा है कि संयुक्त परिवार व्यवस्था (joint family system) के कमजोर पड़ने की वजह से कई बुजुर्ग आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यह कानून उनके लिए सुरक्षा की ढाल है। अदालत ने क्लियर किया है कि सीनियर सिटिजंस एक्ट के तहत बने ट्रिब्यूनल एसेट खाली कराने के ऑर्डर भी दे सकते हैं।
संपत्ति देने से पहले करें ये काम
बता दें कि अगर आप अपनी प्रॉपर्टी (Property Transfer to Children) बच्चों के नाम करने जा रहे हैं या फिर कर चुके हैं, तो कुछ बातों पर जरूर गौर करें। जब भी गिफ्ट डीड (gift deed) बनवाएं तो यह प्रॉपर्टी इस शर्त पर दी जा रही है कि बच्चे मेरी और मेरे जीवनसाथी की पूरी देखभाल करेंगे, इस बात को स्पष्ट तरीके से लिखवाएं
इसके साथ ही अगर अलग से कोई वादा या प्रोमिस लेटर (promise letter) लिखवाया है, तो उसकी कॉपी अपनी पास सेफ रखें। इसके अलावा बच्चों के परेशान करने पर सीधे अपने इलाके के SDM के पास शिकायत दर्ज कराएं और आपको किसी महंगे वकील की जरूरत नहीं है, यह कानून आपके लिए बना है।
इसके अलावा रिश्ता फिर चाहे कितना भी करीबी क्यों न हो, प्रॉपर्टी जैसे मामलों में कागजी कार्रवाई बेहद जरूरी है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बुजुर्गी के लिए सही है।