कच्चे कर्मचारियों को अधिकार देने से नहीं बच सकती सरकार
HR Breaking News (rights to raw workers) सरकारी कर्मचारियों से लंबे समय तक नियमित और आवश्यक प्रकृति के काम लिए जाते हैं, तो ऐसे में नियुक्ति के जरिए उनके सेवा अधिकारों को नकारना कोई आधार नहीं बनता है, लेकिन अब अदालत के स्पष्टीकरण के बाद सरकार कच्चे कर्मचारियों को उनके अधिकारों (rights to raw workers) से दूर नहीं रख सकती है। खबर में जानिए कच्चे कर्मचारियों के अधिकारों के बारे में-
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दिया स्पष्टीकरण
बता दें कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court) का कहना है कि सरकारी विभागों में सालों से एक समान काम करने वाले कर्मियों को सिर्फ संविदा और आउटसोर्सिंग के नाम पर उनके वैध सेवा लाभों से दूर नहीं किया जा सकता है। सरकार एक तरफ कर्मचारियों से लगातार स्थायी प्रकृति के काम भी कराए और उन्हें स्थाई बताकर उनके अधिकार भी नहीं देती है। यह संवैंधानिक व्यवस्था के हिसाब से ठीक नहीं है।
क्यों की थी हरियाणा सरकार की दोनो याचिकाएं खारिज
हाई कोर्ट (HC Orders) ने टिप्पणी दी है कि कर्मचारियों के पक्ष में दिए गए अपने पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग वाली हरियाणा सरकार की दोनो याचिकाएं खारिज की है। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ का कहना है कि सिर्फ आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से नियुक्ति होने से कर्मियों को वैध सेवा लाभों से दूर नहीं किया जा सकता है। हाई कोर्ट ने 24 फरवरी 2026 को इन कर्मियों के पक्ष में निर्णय सुनाया था, जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार (Haryana Government) की ओर से पूर्ण विचार याचिकाएं दायर की थी।
सेवा अधिकारों को नकारने का आधार
सरकार की दलील थी कि कर्मचारी नियमित सरकारी नियुक्ति के अंतर्गत नहीं रखे गए थे, बल्कि आउटसोर्सिंग एजेंसी (outsourcing agency) के माध्यम से संविदा पर लगाए थे। इसलिए उन्हें नियमित कर्मियों के समान लाभ देने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के साल 2016 के जगजीत सिंह फैसला का सहारा नहीं लिया जा सकता है। हाई कोर्ट का कहना है कि कर्मचारियों से लंबे समय तक नियमित प्रकृति के कार्य लिए जाते रहे हैं। ऐसे में नियुक्ति के जरिए उनके सेवा अधिकारों को नकारने का कोई आधार नहीं बनता है।
संवैधानिक नियोक्ता है सरकार
सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और संविधान के अनुच्छेद 14,16 के तहत समानता व निष्पक्षता के सिद्धांत का पालन करना अनिवार्य होगा। अदालत ने स्पष्टीकरण (court clarification) दिया है कि पुनर्विचार याचिका अपील का ऑप्शन नहीं है। पहले दिए फैसले में से ऐसी कोई कानूनी गलती नहीं मिली है, जिसके बेस पर उसमें बदलाव हो सके। अगर 24 फरवरी 2016 के मूल फैसलों का पालन नहीं किया जाता है तो कर्मी आवेदन कर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग भी कर सकते हैं।