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Court का बड़ा फैसला, 60 साल बाद सरकारी विभाग को देना होगा सड़क बनाने पर मुआवजा

Haryana News : अदालत की ओर से एक बड़ा फैसला आया है। 60 साल बाद सरकारी विभाग को अब जमीन अधिग्रहण किए बिना सड़क बनाने का खामियाजा भुगतना होगा। कोर्ट की तरफ से सरकारी विभाग को झटका लगा है। किसानों को अब मुआवजा देने के आदेश दिए गए हैं। 

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Court का बड़ा फैसला, 60 साल बाद सरकारी विभाग को देना होगा सड़क बनाने पर मुआवजा

HR Breaking News (Court Update) हरियाणा में एक 60 साल पुरानी गलती का खामयाजा लोक निर्माण विभाग को भुगतना पड़ेगा। अदालत की ओर से सड़क निर्माण के मामले में किसानों को राहत दी गई है। अब किसानों को मुआवजा दिया जाएगा। इससे सरकार के विभाग की किरकिरी भी हुई है। 

60 साल पहले हुई थी चुक 


हरियाणा में लोक निर्माण विभाग की ओर से 60 साल पहले बड़ी गलती हुई थी। दरअसल, भूमि अधिग्रहण (land acquisition) किए बिना ही सड़क का निर्माण कर दिया गया था। कोई छोटी-मोटे सड़क नहीं, बल्कि गुरुग्राम से फरुखनगर सड़क का निर्माण किया गया था। इस सड़क निर्माण के मामले में लोक निर्माण विभाग को कई बार अदालत के आदेशों के बाद किरकरी का सामना करना पड़ चुका है। 

कोर्ट ने बताया अवैध 


कई बार अदालत (court news update) के आदेश के अनुसार कार्यकारी अभियंता के कार्यालय को सील किया गया है। वहीं फिलहाल सिविल जज आयुष गर्ग की अदालत की ओर से 60 साल पुराने मामले में किसानों को राहत दी गई है। लोक निर्माण विभाग की ओर से मुआवजा देने के लिए आदेश पारित किया गया है। अदालत के अंदर जगत सिंह वर्सेस पीड्ब्लयूडी मामले में साफ किया गया है कि अधिग्रहण प्रक्रिया के बिना जमीन पर कब्जा करना पूरी तरह से अवैध है। किसानों को मुआवजा दिया जाना चाहिए। 

किन्होने दायर किया था मुकदमा 


मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हरियाणा के गुरुग्राम (Gurugram news) का यह मामला है। इसमें बसई के रहने वाले जगत सिंह व अन्य की ओर से मामला दायर किया गया था। उनकी जमीन का खसरा नंबर 72 जो कि कुल एक कनाल 11 मरला बनता है। गांव खेड़की माजरा, धनकोट में स्थित है। जिस पर विभाग की तरफ से बिना अधिग्रहण व किसी नोटिस के 1966 में सड़क बना दी गई। यह सड़क तब से विभाग के पास थी। आसपास के किसानों को इसी सड़क निर्माण में मुआवजा दिया गया था। 

पीडब्ल्यूडी विभाग की ओर से भी किया गया दावा 


मामले (court case) के अनुसार विभाग की ओर से ये भी दावा किया गया कि 1966 में गांव वालों की सहमति से सड़क बनी थी। इस पर कोई जबरदस्ती कब्जा नहीं हुआ था। अदालत में विभाग की उपमंडल अभियंता दीपा मोहन ने स्वीकार भी किया की भूमि अधिग्रहण से संबंधित कोई दस्तावेज नहीं है, ना ही कोई गिफ्ट डीड, एग्रीमेंट और बिक्री दस्तावेज है। ऐसे में कोर्ट ने पाया कि विभाग ने न तो भूमि का रिकॉर्ड पेश किया है और ना ही कोई मुआवजा देने का प्रमाण मिला है। वहीं दूसरी तरफ के अधिवक्ता ने जमाबंदी रिकॉर्ड, कानूनी नोटिस और पूर्व न्यायिक आदेशों का सहारा लिया, जिसके अनुसार जमीन पर अधिकार ग्रामीणों का सिद्ध हुआ। 

मुआवजा देने की कही गई बात 


वहीं अदालत में ग्रामीणों ने भूमि का कब्जा (land acquire) वापस मांगा, लेकिन कोर्ट का मानना है कि सड़क सार्वजनिक उपयोग में है। फिलहाल न्याययोजित समाधान मुआवजा ही होगा। कोर्ट की तरफ से भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1994 के प्रावधानों तथा संशोधनों के अनुसार पूरा मुआवजा व वैधानिक लाभ दिए जाने की बात कही है। साथ में 12% अतिरिक्त वार्षिक राशि देने की मांग पर अदालत ने कहा कि साधारण मुआवजा ही ऐसे में पर्याप्त रहेगा।