Holika Dahan 2022 बिश्नोई समाज के लोग नही करते होलिका दहन, अगले दिन मनाया जाता है जश्न, जानिए कारण

HR Breaking News, हिसार, विष्णु भगवान उपासक व गुरु जम्भेश्वर भगवान के अनुयायी मानने वाले बिश्नोई पंथ के लोग जीव दया व पर्यावरण संरक्षण के लिए विख्यात है। हिंदू होने के बाद भी इस पंथ के लोगों की अलग पहचान ये है कि होलिका दहन के दिन खुशी का दिन न मनाकर शोक स्वरूप मनाते है।
धुलंडी यानी फाग के दिन सुबह मंदिरों में हवन करके पाहल लेते है उसके बाद ही भोजन ग्रहण करते है। जबकि होली का दिन शोक स्वरूप खिचड़ी बनाते है। उसका सेवन भी उसी दिन 5 बजे से पहले करते है।
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स्वामी राजेद्रानंद महाराज बताते हैं कि गुरु जम्भेश्वर महाराज ने अपने शब्दवाणी में इसका विशेष उल्लेख किया। शब्द संख्या 118 में प्रगट जोत विराज, प्रहलाद सूं वाचा कीवी, आयो बार काजे...। खुद को समाज के लोग प्रह्लाद पंथी मानते है। इसलिए समाज के लोग होली का दहन करना तो दूर उसकी लौ भी नहीं देखते हैं।
इसकी मान्यता हैं कि यह आयोजन भक्त प्रहलाद को मारने के लिए किया था। बिश्नोई समाज के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर महाराज विष्णु भगवान के अवतार थे। विष्णु भगवान नृसिंह रूप धारण करके हिरण्यकश्यप को मारा था। उस समय भगवान विष्णु ने प्रहलाद को 33 करोड़ उनके अनुयायी का भी उद्धार होगा।
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जो जिसमें 5 करोड़ प्रहलाद, 9 करोड़ युधिष्ठिर व 7 करोड़ हरिशचंद के साथ उद्धार करके निभाया। बाकि 12 करोड़ जीवों के उद्धार के लिए वचन देकर कलयुग में भगवान जम्भेश्वर के रूप अवतरित हुए। इसलिए बिश्नोई समाज स्वयं को प्रहलाद पंथी मानते हैं। स्वामी राजेंद्रानंद बताते है कि बिश्नोई समाज में सबसे बड़ा नियम सुबह सूर्योदय से पूर्व स्नान का है। यह नियम मनाने वाले अधिकांश व्यसनों से स्वत: दूर हो जाते है।