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UP News : उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं 150 साल पुराने 5 रेवले स्टेशन, आज भी ज्यों की त्यों हैं इमारतें

UP News -  देशभर में 7000 से अधिक और उत्तर प्रदेश में 550 से अधिक रेलवे स्टेशन हैं, जहां प्रतिदिन हज़ारों यात्री ट्रेनें चलती हैं. उत्तर प्रदेश में 5 ऐसे रेलवे स्टेशन हैं जिन्होंने 150 साल से भी अधिक का सफर तय किया है. आज भी इनकी इमारते ज्यों की त्यों हैं-
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UP News : उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं 150 साल पुराने 5 रेवले स्टेशन, आज भी ज्यों की त्यों हैं इमारतें

HR Breaking News, Digital Desk- (UP News) देशभर में 7000 से अधिक और उत्तर प्रदेश में 550 से अधिक रेलवे स्टेशन हैं, जहां प्रतिदिन हज़ारों यात्री ट्रेनें चलती हैं. उत्तर प्रदेश में 5 ऐसे रेलवे स्टेशन हैं जिन्होंने 150 साल से भी अधिक का सफर तय किया है. ब्रिटिश काल में निर्मित ये स्टेशन वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं, जो आज भी अपनी ऐतिहासिक और स्थापत्य कला की विरासत को संजोए हुए हैं. ये स्टेशन राज्य के महत्वपूर्ण यातायात केंद्र बने हुए हैं.

ये रेलवे के विकास-बदलाव के साक्षी भी हैं. सैकड़ों साल बाद आज भी ये उतने ही मजबूत और खूबसूरत हैं. इनमें लखनऊ का चारबाग रेलवे स्टेशन, कानपुर सेंट्रल, आगरा फोर्ट, इज्जत नगर रेलवे स्टेशन और प्रयागराज रेलवे स्टेशन शामिल हैं. इन सभी की अपनी खासियत है. आप भी जानिए इनके निर्माण की दिलचस्प कहानी...

 चारबाग रेलवे स्टेशन की बात निराली-

यह स्टेशन बिशप जॉर्ज हरबर्ट के समय 1914 में बनना शुरू हुआ और 1923 में 70 लाख से अधिक की लागत पर बनकर तैयार हुआ. इसका नक्शा जैकब हॉर्निमैन ने बनाया था.

अब इसे आधुनिक बनाया जा रहा है, लेकिन स्टेशन की मुख्य ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित रखा जाएगा ताकि उसकी सांस्कृतिक विरासत बनी रहे. अंग्रेजी हुकूमत की इस इमारत में मुगल और राजस्थानी वास्तुकला का खूबसूरत मिश्रण है, जो लोगों को आकर्षित करता है. इसके कायाकल्प में मुख्य ऐतिहासिक इमारत को हूबहू वैसा ही रखा जाएगा.

हर रोज 250 से ज्यादा ट्रेनें-

 खास बात यह है कि स्टेशन से हर रोज 250 से भी ज्यादा संख्या में ट्रेनें गुजरती हैं. हॉर्न भी खूब शोर करते हैं, ट्रेनों की आवाज भी होती है, लेकिन बिल्डिंग के बाहर जरा सी आवाज नहीं आती. इसकी बिल्डिंग पर छतरीनुमा छोटे-बड़े कई गुंबद हैं, जो शतरंज के प्यादों की तरह नजर आते हैं.

इमारत पर आधा दर्जन टंकियां-

चारबाग रेलवे स्टेशन की इमारत पर 30,000 लीटर क्षमता वाली लगभग छह (आधा दर्जन) पानी की टंकियां स्थापित हैं. हालांकि टंकियों में पानी मापने के लिए अब नए मापक लग गए हैं, लेकिन स्टेशन निदेशक के कमरे के पास अंग्रेजों के समय का एक पुराना मापक यंत्र आज भी काम कर रहा है. इतने वर्षों के बाद भी यह यंत्र पूरी तरह क्रियाशील है और आज भी टंकियों में पानी का स्तर बताने के लिए उपयोग होता है.

चारबाग रेलवे स्टेशन की मुख्य इमारत में आज के समय पार्सल घर बना हुआ है. पार्सल घर में कुछ आलमारियां ईस्ट इंडिया रेल east India Rail) के समय की हैं. इन पर बना मोनोलॉग ईस्ट इंडिया रेल का है. यह आलमारी अब भी मजबूत हैं. हालांकि अब इन्हें इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.

एक साल 4 माह और 13 दिन में तैयार हुआ था कानपुर सेंट्रल स्टेशन-

 अंग्रेजों ने ही उत्तर प्रदेश के कई स्टेशनों की तरह कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन भी बनाया था. औद्योगिक दृष्टि से अंग्रेजों के लिए कानपुर सेंट्रल काफी महत्वपूर्ण था. साल 1859 में प्रयागराज से कानपुर तक रेल पटरी बिछाने का काम प्रारंभ हुआ था और तीन मार्च 1859 को पहली ट्रेन इलाहाबाद से कानपुर की ओर रवाना हुई थी. इसमें कुल 10 कोच थे. इनमें ईंट और कंकड़ डालकर भेजे गए थे. ट्रेन की स्पीड 10 किलोमीटर प्रति घंटा थी. कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और हावड़ा जंक्शन के बाद देश का तीसरा सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन माना जाता है. कानपुर और प्रयागराज के बीच 180 किलोमीटर की दूरी को कवर करने वाली भारत में उस समय यह चौथी रेलवे लाइन थी. ब्रिटिश शासन काल के दौरान कानपुर शहर को मूल रूप से कावनपुर के नाम से जाना जाता था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसका नाम परिवर्तित कर दिया गया. शहर के केंद्र में होने के कारण ही कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन इसका नाम रखा गया.

16 नवंबर 1928 को रखी गई नींव- 

रेलवे के मुख्य आयुक्त सर आस्टन होडो केटी और अधिकारी जान एच हैरिमन ने 16 नवंबर 1928 को कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन की नींव रखी थी. एक साल चार माह और 13 दिन में सेंट्रल स्टेशन बनकर तैयार हो गया. उस समय इस स्टेशन को बनाने में 19.75 लाख रुपए खर्च हुए थे. 29 मार्च 1930 को सेंट्रल स्टेशन से मुंबई के लिए ट्रेनों के संचालन की शुरुआत की गई थी.

 अंग्रेजों की तीन पीढ़ियों ने बनाया था ये स्टेशन-

 अंग्रेजों के बनाए गए रेलवे स्टेशनों की फेहरिस्त में बरेली के इज्जत नगर रेलवे स्टेशन की कहानी अलग है. यह स्टेशन काफी ऐतिहासिक माना जाता है. 14 अप्रैल 1952 में इस डिवीजन की शुरुआत हुई थी. 1875 में पहले नैनीताल के पहाड़ी इलाके को मैदानी इलाके से जोड़ा गया. उस समय रेलवे के अधिकारी एलेग्जेंडर आइजेट (Railway official Alexander Izett) पर काम कर रहे थे. उनके नाम पर ही आइजेट नगर रेलवे स्टेशन नाम रखा गया. हिंदी में इज्जत नगर रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता है. बरेली से लखनऊ के लिए भी उन्होंने ही रेलवे लाइन डाली थी. एलेग्जेंडर आइजेट के बेटे लेफ्टिनेंट कर्नल डब्ल्यूआर आईजेट और उनके पोते सर जेआर आइजेट ने भी इज्जत नगर रेल मंडल पर काम किया. ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजों की तीन पीढ़ियों ने मिलकर बरेली के इज्जत नगर रेलवे स्टेशन का रूप और आकार देने में अहम भूमिका निभाई.

 166 साल पुराना प्रयागराज रेलवे स्टेशन-

166 साल पहले वर्ष 1859 में अंग्रेजों ने इस स्टेशन की नींव रखी थी. इस स्टेशन को पहले इलाहाबाद जंक्शन के नाम से जाना जाता था. उत्तर प्रदेश सरकार ने फरवरी 2020 में इलाहाबाद जंक्शन का नाम बदलकर प्रयागराज जंक्शन कर दिया. हावड़ा गया दिल्ली लाइन, हावड़ा दिल्ली मुख्य लाइन, प्रयागराज मऊ गोरखपुर मुख्य लाइन और हावड़ा प्रयागराज मुंबई लाइन पर स्थित रेलवे स्टेशन है. यह उत्तर मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय है. पहली ट्रेन 1859 में प्रयागराज से ही कानपुर के लिए संचालित हुई थी. 1864 में हावड़ा से दिल्ली के लिए पहली सीधी ट्रेन चली. डिब्बों को प्रयागराज में यमुनापार नावों से ले जाया गया था. यमुना पर पुराने नैनी पुल के पूरा होने के साथ ही 1865-1866 में सीधी ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया था. इस स्टेशन का नाम भले ही बदल गया लेकिन अभी भी इसकी पहचान अंग्रेजों के स्थापत्य से ही है.

 आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन-

151 साल पहले उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में फोर्ट रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया गया था. साल 1874 में यह रेलवे स्टेशन बना था. ब्रिटिश काल में निर्मित हुए आगरा फोर्ट स्टेशन मालवा राजपूताना रेलवे के हिस्से में था, तब राजस्थान आगरा और मध्य भारत के क्षेत्रों को जोड़ने वाला यह स्टेशन काफी महत्तवपूर्ण केंद्र था. इस स्टेशन की वास्तु कला की विशेषता उसके बारामदे हैं, जो लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं. इस स्टेशन में मुगल स्थापत्य कला और औपनिवेशिक काल का प्रभाव खूब नजर आता है. कोलकाता, दिल्ली मुंबई और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला आगरा

फोर्ट रेलवे स्टेशन (Fort Railway Station) प्रमुख केंद्र रहा है. भारत की स्वतंत्रता से पहले आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन ब्रिटिश सेना और प्रशासन के लिए इंपॉर्टेंट लॉजिस्टिक बेस था. आगरा में पहली मीटर गेज रेलवे लाइन भरतपुर से आगरा फोर्ट स्टेशन तक बिछाई गई थी, जिसे राजपूताना रेलवे ने 11 अगस्त 1873 में बनवाया था. वर्ष 1874 में इसकी लंबाई बढ़ाकर दिल्ली से बांदीकुई तक कर दी गई थी. आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन देश के उन स्टेशनों में से एक था जहां ब्रॉड गेज और मीटर गेज दोनों लाइन हुआ करती थीं.

चारबाग की खासियत पर क्या कहते हैं नवाब-

चारबाग रेलवे स्टेशन की ज़मीन (Charbagh Railway Station land) पहले शीश महल फैमिली की थी, जिसे अंग्रेजों ने रेलवे लाइन बिछाने के लिए लिया था, यह जानकारी नवाबों के वंशज मसूद अब्दुल्ला देते हैं. स्टेशन की इमारत का आर्किटेक्चर अवध, ईरानी और राजपूताना शैलियों का मिश्रण है. यह लाल पत्थर से बनी है और इसकी ख़ूबसूरती ऐसी है कि ऊपर से देखने पर यह शतरंज के बोर्ड (बिसात) के समान दिखाई देती है, जिस पर जैसे शतरंज खेला जा रहा हो.

सबसे बड़ी खूबी यह है कि ऐसा सिस्टम बनाया गया है कि अंदर कितनी भी ट्रेन गुजरें, लेकिन अगर आप बाहर खड़े होंगे तो आवाज सुनाई ही नहीं देगी. इनके जो गुंबद हैं, उससे पानी की सप्लाई पूरे स्टेशन में है. कहीं पर आपको अलग से वाटर टैंक लगे नहीं देखेंगे, बल्कि जो गुंबद-मीनारें हैं, उसी में वाटर टैंक बना दिए गए हैं. पूरी सप्लाई वाटर की उसी से होती है. यह बहुत ही लाजवाब खूबसूरत रेलवे स्टेशन है और हिंदुस्तान में जो चंद खूबसूरत रेलवे स्टेशन है उनमें से यह एक है.