Supreme Court : सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्णय
HR Breaking News - (govt employees news)। अगर आप एक सरकारी कर्मचारी हैं तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने को लेकर सुप्रीम फैसला लिया है। इस फैसले के बाद चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। कर्मचारी पर अपराध का मुकदमा (supreme court) चलाने की एक समय सीमा निर्धारित की गई है, इसी से जुड़ा निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है।
कोर्ट ने केस चलाने की अनुमति को लेकर भी बड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार, रिश्वत (Bribe case decision) जैसे अपराध के मामले में केस दर्ज होने में देरी से कई तरह के संदेश समाज में जाते हैं। इस कारण से यह निर्णय हर कर्मचारी (latest update for govt employees) के लिए और भी अहम बन गया है।
यह कहा है सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में-
सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला (supreme court) देते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार में लिप्त व रिश्वतखोरी करने वाले किसी भी व्यक्ति पर कार्रवाई करने में देरी करना सही नहीं है। उस पर केस दर्ज (FIR rules for govt employees) करने में देरी नहीं की जानी चाहिए। दोषी पाए जाने पर तुरंत दंडित करना जरूरी है।
ऐसा न करने पर अपराधियों को ढील देने का कल्चर बनता है, जो कानून, देश व समाज के लिए भी सही नहीं है। लोग न्यायपालिका में विश्वास रखते हैं और उस विश्वास को ऐसे लोगों पर कार्रवाई में देरी से झटका लगता है। इस टिप्पणी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट (supreme court order) ने रिश्वत लेने सहित अन्य आपराधिक मामलों में संलिप्त पाए जाने वाले सरकारी अधिकारियों पर केस चलाने की अनुमति के लिए चार माह का प्रावधान (fIR provisions in law) अनिवार्य करने का निर्णय लिया है।
देरी के लिए कौन होगा जिम्मेदार-
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) ने यह भी कहा है कि अगर कोई सरकारी अफसर आपराधिक मामले में लिप्त पाया जाता है तो केस या कार्रवाई में देरी के लिए सक्षम प्राधिकार को इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा। इस स्थिति में जिम्मेदार प्राधिकार पर केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission) सीवीसी अधिनियम के अनुसार कार्रवाई करेगा।
सक्षम प्राधिकार को रखना होगा यह ध्यान-
सुप्रीम कोर्ट (supreme court news) के दो जजों की पीठ ने कहा कि केस चलाने की अनुमति चार माह के भीतर ली जाए। अगर अनुमति देने में देरी की जा रही है तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट (supreme court verdict) में तुरंत अपील कर सकते हैं। यह देरी किसी भी सूरत में सरकारी कर्मियों पर आपराधिक केस निलंबित करने का आधार नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट (supreme court big decision)ने 30 पन्नों के अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि केस चलाने की अनुमति देने वाला प्राधिकार यह ध्यान रखे कि कार्रवाई को लेकर लोगों का कानून में जो विश्वास बना हुआ है, उसे बरकरार रखा जाए।
कानूनी जांच होती है अनुपयोगी साबित-
सुप्रीम कोर्ट (supreme court) की पीठ ने कहा केस चलाने की अनुमति में देरी से कानूनी जांच भी अनुपयोगी साबित होती है। यह समय पर ही की जानी चाहिए, इसके अलावा प्राधिकार देरी करता है तो आरोप तय करने की प्रक्रिया में बाधा आती है। इस तरह की देरी भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी (govt officer FIR rules) को बचाने जैसा प्रतीत होता है, जो एक घातक होने के साथ ही बड़ा सवाल भी है। ऐसे लोगों को दंडित नहीं किए जाने की संस्कृति नहीं ऊभरनी चाहिए। इस प्रकार के मामले में देरी भावी पीढ़ी में भ्रष्टाचार को जीवन का हिस्सा मानने की सोच पैदा कर सकती है।
इस अवधि में किया एक माह का विस्तार -
सुप्रीम कोर्ट (supreme court decision) ने यह सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले के विरोध में की गई अपील को लेकर की है। यहां पर यह गौरतलब है कि कानूनी प्रावधान के अनुसार भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 97 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत लोक सेवकों को आपराधिक मामलों में आरोपी बनाने के लिए तीन माह का समय दिया जाता है। यह समय सीबीआई (CBI) व दूसरी जांच एजेंसियों को दिया जाता है। इसमें एक माह की अवधि और बढ़ा दी है, ताकि कानूनी सलाह ली जा सके और केस में देरी न हो। केस चलाने की अनुमति देने में देरी पर सक्षम प्राधिकार को जिम्मेदार माना जाएगा।