Success Story: सफाई का काम करके गुजारा करती थी मां, जेईएन बनकर बेटे ने बदली किस्मत

पंखों से नहीं, हौसलों से उड़ान होती है. अगर आपमें कुछ करने की इच्‍छाशक्‍ति हो, तो संसाधनों के अभाव में भी आप अपने लक्ष्‍य को पा लेते हैं. आज हम आपको एक ऐसी कहानी बताने जा रहे है. जिसमें सफाई का काम करके गुजारा करती थी मां, जेईएन बनकर बेटे ने बदली किस्मत. आइए जानते है इनकी कहानी.
 
 

HR Breaking News, Digital Desk- कहते हैं कि कुछ कर गुजरने का जुनून और जज्‍बा हो तो संसाधन सुविधाएं मायने नहीं रखतीं.  कुछ ऐसा ही कर दिखाया है झुंझुनूं के एक होनहार ने. यह कहानी एक ऐसे युवा की है, जिसने अभावों से संघर्ष कर कामयाबी पाई है. महज सात साल की उम्र में उसके सिर से पिता का साया उठ गया. मां को सफाई का काम करना पड़ा.

महज चार साल बड़े भाई को इसलिए स्कूल छोड़नी पड़ी, क्योंकि उनकी मां दोनों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकती थी. इसलिए छोटी सी उम्र में मां के साथ मजदूरी कर छोटे भाई को पढ़ाया. मां ने बेटे को एकेडमिक शिक्षा ही नहीं दिलवाई बल्कि इंसान बनना भी सिखाया. मां ने उसे अभावों से लड़कर अपनी मंजिल हासिल करने की सीख दी और आखिरकार वह दिन आ ही गया जब उसका बेटा सरकारी अधिकारी बन गया.

जेईएन भर्ती परीक्षा में पाई सफलता-


झुंझुनूं शहर की वाल्मीकि बस्ती के रहने वाले अनिल डुलगच ने राज्य कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा पास की है, जिसके बाद उनका चयन स्वायत्त शासन निकाय के जेईएन पद पर हो गया. अनिल जब 7 साल के थे, तब पिता किशनलाल डुलगच का निधन हो गया.

परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इसके बाद अनिल की मां गीता देवी ने परिस्थितियों को संभाला और शहर के एक निजी छात्रावास में सफाई का काम शुरू किया. सफाई से जो कुछ मिलता, उससे अपने दोनों बेटों को पढ़ाने लगी. तब अनिल के बड़े भाई नरेंद्र ने मां की परेशानियों को समझते हुए पढ़ाई छोड़ मां के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया, ताकि छोटा भाई पढ़ सके.


ऐसे की पढ़ाई-


अनिल की पढ़ाई लिखाई एक सरकारी स्कूल में हुई. 12वीं पास करने के बाद अनिल को आईआईटी की परीक्षा के लिए बड़ी मुश्किल से फार्म फीस का जुगाड़ हो पाया, लेकिन मां की हिम्मत के सहारे अनिल ने इस परीक्षा को पास कर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र से बीटेक की डिग्री हासिल की. पार्ट टाइम जॉब कर तैयारी के लिए किताबें खरीदीं, फीस भरी.

बीटेक करने के बाद अनिल ने मां को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए कोचिंग लेने की बात कही. मां के पास कोचिंग में देने के लिए मोटी फीस नहीं थी, लेकिन उसने बेटे का हौसला बढ़ाया. जैसे तैसे करके उसे कोचिंग में दाखिला दिला दिया. दिल्ली में कोचिंग में साल के 2 लाख रुपए खर्च होते. फीस के लिए अनिल ने प्राइवेट कंपनी में जॉब किया. इसके बाद प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हुए और सफल रहे.

अनिल ने अपनी पूरी सफलता का श्रेय अपने मां और परिवार को दिया है. अनिल डुलगच का कहना है कि जिन्दगी में कामयाबी आसानी से नहीं मिलती है. इसके लिए कड़ी मेहनत के साथ बुलंद हौंसला होना सबसे बड़ी जरूरत है.