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प्राकृतिक खेती में कारगर साबित हो रही गाय के गोबर व गोमूत्र की खाद, खर्च घटा, उत्पादन बढ़ा

natural farming : रासायनिक खाद व कीटनाशकों के उपयोग के इस दौर में अब प्राकृतिक खेती कारगार साबित हो रही है। किसान गाय के गोबर व गोमूत्र की खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिससे खर्च घट गया है और उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। चलिए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।    
 
प्राकृतिक खेती में कारगर साबित हो रही गाय के गोबर व गोमूत्र की खाद, खर्च घटा, उत्पादन बढ़ा

HR Breaking News (natural farming) : रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को कम करके भी खेती से बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है। अटेली क्षेत्र के गांव सिलारपुर के किसान शेर सिंह (Sher Singh, a farmer from Silarpur village) ने प्राकृतिक खेती अपनाकर इसे साबित किया है। कृषि विभाग और आत्मा योजना के मार्गदर्शन में उन्होंने 3 एकड़ में प्राकृतिक तरीके से सरसों की खेती शुरू की। इसका असर पैदावार और लागत, दोनों पर दिखाई दिया। पहले जहां एक एकड़ में 6 से 7 क्विंटल सरसों होती थी, वहीं अब उत्पादन बढ़कर 11 से 12 क्विंटल तक पहुंच गया है।

खर्च कम करने के लिए अपनाया ये तरीका 

शेर सिंह पहले यूरिया, डीएपी (DAP) और कीटनाशकों के सहारे पारंपरिक तरीके से खेती करते थे। समय के साथ खाद और दवाइयों का खर्च बढ़ने लगा। खेत की मिट्टी भी कठोर होने लगी और उसकी पानी सोखने की क्षमता प्रभावित हुई। इसके बाद उन्होंने खेती का तरीका बदलने का फैसला लिया। 

कृषि विभाग और आत्मा योजना (atma yojana)के अधिकारियों ने उन्हें प्राकृतिक खेती की तकनीकें समझाईं। विभाग की ओर से उन्नत किस्म की सरसों का प्रदर्शन प्लॉट दिया गया और प्रशिक्षण के दौरान घर पर ही प्राकृतिक खाद व अन्य कृषि इनपुट तैयार करने की जानकारी दी गई।

प्रति एकड़ 10 हजार रुपए तक घटा खर्च

प्राकृतिक खेती अपनाने का सबसे बड़ा फायदा लागत में कमी के रूप में सामने आया। विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सरसों की खेती पर पहले प्रति एकड़ करीब 12 हजार रुपए खर्च होते थे। अब यह घटकर लगभग 2 हजार रुपए रह गया है। इस तरह एक एकड़ में 10 हजार रुपए तक की बचत हो रही है। तीन एकड़ में खेती से होने वाला शुद्ध वार्षिक लाभ भी पहले करीब 1.40 लाख रुपए था, जो अब बढ़कर लगभग 3.25 लाख रुपए बताया गया है।
शेर सिंह ने बताया कि अब वे खेत में यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल नहीं करते। फसल की जरूरतों को पूरा करने के लिए गोबर और गोमूत्र से तैयार प्राकृतिक घोल व खाद का उपयोग करते हैं।

ये प्राकृतिक तरीके अपनाएं (natural farming ke trike)

फसल की शुरुआत (Agriculture Department) से ही शेर सिंह ने प्राकृतिक तकनीकों को अपनाया। सरसों की बुवाई से पहले बीजों को गोबर, गोमूत्र, चूना और खेत की मिट्टी से तैयार बीजामृत से उपचारित किया। इसके बाद मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मेड़ की मिट्टी से जीवामृत व घनजीवामृत तैयार कर खेत में डाला।उन्होंने फसल के अवशेषों से जमीन को ढकने वाली मल्चिंग तकनीक भी अपनाई।