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राखीगढ़ी अंतरराष्ट्रीय महोत्सव : राखीगढ़ी साइट-7 में आगे भी होगी खोदाई 

Rakhigarhi International Festival : राखीगढ़ी अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में लोगों को प्राचीन समाज की जीवनशैली को समझने में मदद मिलती है। अभी राखीगढ़ी साइट-7 (Rakhigarhi Site-7) में आगे भी खोदाई की जाने वाली है। इस प्रोजेक्ट से राखीगढ़ी की ऐतिहासिक विरासत को नया स्वरूप मिलेगा। अब सरकार ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए देश-विदेश में पहचान बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
 
राखीगढ़ी अंतरराष्ट्रीय महोत्सव : राखीगढ़ी साइट-7 में आगे भी होगी खोदाई

HR Breaking News (Rakhigarhi International Festival) भारत की सभ्यता, सांस्कृतिक परंपराओं का राखीगढ़ी महत्तवपूर्ण प्रतीक है। सरकार की ओर से भी पुरातात्विक स्थल को नई पहचान दिलाने के लिए लगातार कोशिश की जा रही है। अभी राखीगढ़ी साइट-7 (Rakhigarhi International Festival) में खोदाई का काम आगे भी किया जाने वाला है, जिससे इस ऐतिहासिक स्थल को नया स्वरूप मिल सकेगा। खबर में जानिए इस बारे में विस्तार से-

 

सरस्वती सिंधु सभ्यता कॉन्फ्रेंस में इन पर हुई चर्चा 


दरअसल, आपको बता दें कि हड़प्पाकालीन सभ्यता (hadppakalin sabhyata) के अलग-अलग केंद्रो में मकान, मिट्टी के बर्तन, मुहरों और नगर निर्माण से जुड़ी समानताएं है, जो प्राचीन समाज की जीवन शैली की झलक दिखाती है। अंतरराष्ट्रीय राखीगढ़ी महोत्सव के अंतर्गत बीते दिनों राखीगढ़ी संग्रहालय (Rakhigarhi Museum) में आयोजित सरस्वती सिंधु सभ्यता कॉन्फ्रेंस में पुरातत्वविदों ने धोलावीरा, बनावली और राखीगढ़ी के प्रमाणों पर बातचीत की है।

 

मानव कंकालों से जुड़े शोध पहलुओं पर चर्चा 


ऐसे में प्राचीन जल प्रबंधन व्यवस्था (water management system) और साइट-7 में मिले मानव कंकालों से जुड़े शोध पहलुओं पर बातचीत की गई। कॉन्फ्रेंस में पद्म श्री डॉक्टर आरएस बिष्ट, डॉक्टर संजय मंजुल और जीवन खारवाल ने अपने शोध और अनुभवों को पेश किया है। जानकारी के अनुसार कई सालों से मिले अवशेषों की तुलनात्मक स्टडी सभ्यता की बसावट, नगर निर्माण, सामाजिक जीवन को समझने में बेहद जरूरी है।

 

धौलावीरा और बनावली स्थलों की खासियत 


पद्मश्री ने धौलावीरा और बनावली जैसे स्थलों की खासियत (Specialties of Dholavira and Banawali) के बारे में भी बताया है। उनका कहना है कि मकान में मिट्टी के बर्तनों, मुहरों और नगर निर्माण से जुड़े अवशेषों की स्टडी से हड़प्पाकालीन केंद्रो के बीच समानताओं और विशेषताओं के बारे में ज्ञान होता है। इन प्रमाणों से तत्कालीन समाज की संरचना और जीवन शैलियों को समझा जा सकता है।

 

 

राखीगढ़ी में जल भंडारण से जुड़े स्ट्रक्चर की जानकारी 


डॉ संजय मंजुल की ओर से राखीगढ़ी में खुदाई के दौरान जो अवशेष (Excavated remains at Rakhigarhi) मिले हैं, उनकी और जल भंडारण से जुड़े स्ट्रक्चर की जानकारी दी गई है। उनका कहना है कि यह प्रमाण प्राचीन बस्ती की बसावट और पानी के प्रबंध की व्यवस्था को समझने में बेहद जरूरी है। मानव कंकालों के पास मिली दीवारों के अवशेष भी शोध की दृष्टि से जरूरी है।

साइट नंबर-7 में मिले मानव कंकाल


डॉ मनोज सक्सेना ने राखीगढ़ी की साइट नंबर-7 में मिले मानव कंकालों के बारे में बताया है। उनका कहना है कि क्षेत्र में आगे खुदाई की जाने वाली है। कंकालो और साथ में मिले अन्य अवशेषों के वैज्ञानिक अध्ययन से प्राचीन लोगों की जीवनशैली और दफनाने की परंपराओं के बारे में जानकारी मिलेगी। कॉन्फ्रेंस में विशेषताओं ने पुरातात्विक प्रमाणों के साइंटिफिक स्टडी और कई स्थलों की तुलना पर भी खास फोकस किया है।

राखीगढ़ी में बन रही शोध की व्यापक संभावनाएं 


उनका कहना है कि राखीगढ़ी में अभी शोध की व्यापक संभावनाएं (Research possibilities at Rakhigarhi) बनी है। नए अध्ययनों से सरस्वती सिंधु सभ्यता के इतिहास और सामाजिक जीवन को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। 


इसके अलावा राखीगढ़ी में आधुनिक म्यूजियम कंपलेक्स (Museum Complex at Rakhigarhi) का काम भी जल्दी पूरा किया जाने वाला है और बाकी बचे काम के लिए 188 करोड़ रुपए की राशि की मंजूरी दी गई है। इससे यह स्थल पुरातात्विक शोध और संस्कृत गतिविधियों तथा पर्यटन के प्रमुख केंद्रों के रूप में विकसित होगा।


 कॉन्फ्रेंस में राखीगढ़ी में बेहतर काम करने पर एसडीएम विकास यादव, दिनेश श्योराण, अप्पू सहारण को भी सम्मानित किया। इस दौरान डॉक्टर संजय मंजुल, डॉक्टर अरुण मुंजाल, मनमोहन, डॉक्टर पंकज गोयल भी मौजूद रहे हैं।